My trophy Wife! Romantic love story part 2

My trophy Wife! Romantic love story part 2

कहानी के पहले My trophy Wife! Part1 भाग में आपने पढ़ा कि Miss India में फाइनलिस्ट रह चुकी कनिका की शादी पेशे से डॉक्टर और बिजनेसमैन आदित्य से हो जाती है । कनिका को लगता है कि आदित्य उसे पत्नी की तरह रखेगा लेकिन आदित्य ने साफ बोल दिया कि वो उसे पत्नी का दर्जा नहीं दे सकता है। कुछ ही दिनों में कनिका समझ गई थी कि वो बस आदित्य की बेशुमार दौलत को दुनिया के सामने दिखाने का एक जरिए मात्र है ।

वो इसी पहचान के साथ जीने भी लगी थी कि एक दिन आदित्य के चचेरे भाई सिद्धार्थ के आने की बात हुई । सिद्धार्थ के आने के बाद आदित्य और कनिका दोनों ने परफेक्ट कपल को एक्टिंग शुरू कर दी । इसी सिलसिले में बात घूमने फिरने और शॉपिंग पर आ गई । सिद्धार्थ ने साफ कह दिया कि उसे कनिका के साथ शॉपिंग पर जाना है तो आदित्य ने भी उसे जाने के लिए बोल दिया । अब आगे –

कनिका सिद्धार्थ के साथ शॉपिंग पर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन अब आदित्य ने उससे जाने को कह दिया था। वह खुद तो ऑफिस चला गया था, ऐसे में मेहमानवाज़ी कनिका को ही करनी थी। इसलिए वह सिद्धार्थ के साथ शॉपिंग पर चली गई। वहाँ सिद्धार्थ ने ज़िद की, तो उसके साथ मूवी भी देखनी पड़ गई। इसके बाद करोल बाग के आसपास के नज़ारे दिखाते हुए शाम तक दोनों वापस आ गए।

trophy wife

आदित्य आज ऑफिस से जल्दी घर आ गया था, इसलिए उसे उन दोनों का इंतज़ार करना पड़ा।
“ऑफिस से इतनी जल्दी आ गए?” घर आते ही आदित्य को लिविंग एरिया में टहलते देखा, तो कनिका ने पूछा।

“मैंने सोचा कि सिद्धार्थ अकेले बोर हो रहा होगा, इसलिए आ गया। मुझे क्या पता था तुम भाभी-देवर नगर भ्रमण से ही वापस नहीं आए होगे।”

“बोर तो मैं सच में हो गया हूँ, भाई। भाभी जी न तो खुलकर हँसती हैं, न खुलकर बोलती हैं। मैं तो इनके साथ जाकर ही बोर हो गया।”

“देखा, मैंने पहले ही कहा था परेशान हो जाओगे तुम।”

“देवर जी, अभी आपने मुझे जाना नहीं है। जब मुझे समझ जाएंगे, तो आपकी यह गलतफहमी दूर हो जाएगी।” कनिका मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।

“चल, तेरी बोरियत मैं दूर करता हूँ। आजा वीडियो गेम खेलते हैं।”

“नहीं, वीडियो गेम नहीं भाई, चेस खेलते हैं न।”

“चलो ठीक है, जो तुम्हारी मर्ज़ी।”

“ओके, मैं बस चेंज करके आ रहा हूँ। दस मिनट में, तब तक आप बिसात लगाइए।”

मैदान सज चुका था। टेबल के एक छोर पर आदित्य और दूसरे छोर पर सिद्धार्थ बैठे ध्यानमग्न थे। टेबल के साइड में कनिका बैठी दोनों का गेम ध्यान से देख रही थी। तीनों के सिर झुके हुए थे और अगली चाल का इंतज़ार कर रहे थे।

दोनों में से जो भी शतरंज जीतेगा, उसे कनिका के हाथ का बना कपकेक खाने का मौका मिलता। यह शर्त सिद्धार्थ ने रखी थी और आदित्य ने बिना बदलाव के मान ली।

“भाभी, आपको पता है, मैंने बचपन में आदित्य को बहुत हराया है। शुरुआत में ही इनकी रानी ले लेता था… और देखो, आज भी इनकी रानी तक पहुँचने ही वाला हूँ।” कहते हुए सिद्धार्थ ने आदित्य का एक और प्यादा मार दिया।

“तब छोटा था तू। ज़रा-सा हारने पर रोने लगता था, तो क्या करता मैं? मुझे जानबूझकर हारना पड़ता था। लेकिन देख, आज तो मैंने तेरी रानी जीत ली।” कहते हुए आदित्य ने उसकी रानी मार दी।

“No way! यह तो मैंने देखा ही नहीं था।”

“मैंने तुम्हें मौका ही नहीं दिया नोटिस करने का…”

“भाई, आपको भाभी की कसम, जो मुझे हराया तो!”

“अरे, यह क्या बात हुई? ऐसा थोड़े करते हैं।”

“करने दो न, इसी बहाने मुझे भी भाभी के हाथ का प्यार मिल जाएगा। है न, भाभी?”

कनिका खेल में खोई हुई थी। तभी सिद्धार्थ ने उसकी आँखों पर आई लट हटाई, तो वह चौंक गई। “हाँ, क्यों नहीं,” उसने धीरे से कहा।

जैसा तय था, जीतने वाले के लिए कनिका कपकेक बनाने लगी।
“भाभी, मैं हेल्प कर दूँ?” सिद्धार्थ किचन में उसके बिल्कुल पीछे आकर खड़ा हो गया।

“उफ! आपने तो डरा ही दिया। इतनी चोरी से कौन आता है? बाहर जाइए।”

“सॉरी, डराने का इरादा नहीं था।”

“नहीं, मुझे अकेले काम करना अच्छा लगता है। कुछ चाहिए होगा तो शांता और महेश्वरी हैं।” कनिका थोड़ा दूर खड़ी हो गई।

“तो मैं जाऊँ?”

“हाँ।”

“ऐसे नहीं जाऊँगा, जब तक आप मुझे ‘तुम’ कहकर नहीं बुलातीं।”

“मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ?”

“एक साल बड़ा हूँ, पर देवर ही तो हूँ।”

“ठीक है… तुम जाओ।” कनिका ने बात खत्म की।

“ये हुई न बात, अब हम दोस्त हुए।” उसने कंधे पर हाथ रखा, तो कनिका ने तुरंत हाथ झटक दिया—”अंडे निकाल लाऊँ फ्रिज से।”

रात में सिद्धार्थ अपना कपकेक लेकर आदित्य के साथ टीवी देखने बैठा।

“मुझे पता है, आपका भी मन हो रहा है, लेकिन ये मैं नहीं दूँगा। भाभी ने खास मेरे लिए बनाया है।”

“तुम ही खा लो। शेफ मेरी बीवी है, मैं कभी भी खा सकता हूँ।”

“काश, मैं भाभी को अपने साथ ले जा पाता।”

“वो कहीं नहीं जाएँगी। मेरी शेफ हैं।”

“So possessive! Sharing is caring।”

तभी कनिका आ गई। दोनों को देखकर उसके कदम ठिठक गए।

“क्या हुआ?” आदित्य ने पूछा।

“कुछ नहीं… कॉफी मशीन ठीक नहीं थी।”

आदित्य किचन गया, मशीन ठीक थी।
“मैंने बस तुम्हें कपकेक खाने के लिए बुलाया था,” कनिका ने दूसरा कपकेक दिया।

“मेरे लिए भी?”

“हाँ… उनके सामने देती तो उन्हें बुरा लगता।”

“वो ऐसा नहीं सोचता। शरारती है, पर दिल का साफ है।”

“मैं रिश्ते का मान रखूँगी,” कनिका ने कहा।

अगले दिन कनिका तोता-मैना को दाना दे रही थी। तभी पीछे से सिद्धार्थ ने उसकी आँखें बंद कर दीं।

“ऐसी हरकतें मुझे पसंद नहीं,” उसने हाथ झटक दिया।

“सॉरी… लगा अच्छा लगेगा।”

“बिना इजाज़त छूना मुझे अच्छा नहीं लगता।”

“तब तो आदित्य भाई के साथ भी ऐसा ही होगा?”

“उनमें और तुममें बहुत फर्क है।”

“जैसे?”

“छोड़ो… नाश्ता किया?”

“नहीं, आपको बुलाने आया था।”

“मैंने कर लिया… अब तुम करो।”

सिद्धार्थ ने पिंजरे में बैठे पक्षियों को देखा।
“ये आपके हैं?”

“हाँ।”

“आदित्य की आदत है, पसंद की चीज़ को कैद करके रखने की… चाहे इंसान हो या जानवर।”

“मतलब?” कनिका सख्त हो गई।

“मैं इन्हें आज़ाद करने जा रहा हूँ।”

“नहीं!” कनिका जल्दी से चढ़ी, पैर फिसला और वह गिरने लगी। सिद्धार्थ ने पकड़ लिया। वह उसके सीने से जा लगी। उसने खुद को संभालकर अलग किया।

“आप ठीक हैं?”

“हाँ… बस पिंजरा मत खोलना।” वह जल्दी से अंदर चली गई।

सिद्धार्थ अपनी बाँहों को देख मुस्कुरा दिया।

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